Saturday, September 11, 2010
पवित्र मौके पर पाक परस्तों का पाप
गणेश चतुर्थी और ईद के सुखद संयोग को हुर्रियत के नाग इस तरह अपवित्र करेंगे किसी ने कल्पना नहीं की थी। कश्मीर में सरकार ने ईद की खुशियां मनाने के लिए कफ्र्यू हटाया था, लेकिन वहां दुआ करने के बजाए लोगों ने उपद्रव किया। नामज अदा करने के जमकर उपद्रव किया, भारत विरोधी नारे लगाए, तिरंगे को आग लगाई। सुरक्षा बलों को सख्त निर्देश थे कि लोगों को खुशी-खुशी ईद मनाने दी जाए, कुछ भी हो जाएग कहीं कफ्यू नहीं लगेगा, कहीं कोई पाबंदी नहीं होगी, कोई गाली नहीं चलाएगा। क्या मजाक है, गद्दारों से मोहब्बत किस लिए दिखाई जा रही है समझ नहीं आता।क्या केंद्र ने उन पाकिस्तान परस्तों का ठेका ले रखा है जो जिस थाली में खा रहे हैं उसी थाली में छेद कर रहे हैं। जब देशवासियों की गाढ़ी कमाई का अरबों रुपए कश्मीर पर लुटाया जा रहा है तो उन कमीनों को लात मारकर बाहर क्यों नहीं करते जो पाकिस्तनी झंडे फहरा कर देशवासियों की भावनाओं और देश का अपमान कर रहे हैं। कश्मीर अभी भी देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा संघीय व्यवस्था में भारी है, चाहे वह कर वसूली हो या फिर विभिन्न कानूनों का समान रूप से लागू करना। बावजूद इसके विकास के लिए विशेष पैकेजों की बाढ़ लगातार उफान पर रहती है। कश्मीर में ईद के मुबारक मौके पर हुर्रियत के कमीनों ने जो किया उसने स्पष्ट कर दिया कि यह इंसान और मुसलमान कुछ भी होने के लायक नहीं हैं।अब जरा पाकिस्तान को देखें, खुद को इस्लाम के अलंबरदार कहने वाले यहां के राक्षसों ने एक नाबालिग हिन्दू लडक़ी को अगवा कर जबरदस्ती मुसलमान बना दिया गया, पुलिस ने केस दर्ज नहीं किया, उल्टे समझा दिया कि इसका कोई लाभ नहीं क्योंकि इस रिपोर्ट को अदालत रद्द कर देगी। फिर भी हमारी सरकार इनके साथ प्यार की पींगे बढ़ा रही है। अमन की दुआएं करने के मौके पर इंसानियत को शर्मशार करने वाले क्या मुसलमान हो सकते हैं। पाकिस्तान इस्लामिक राष्ट्र के नाम पर एक कलंक है। इससे और इसके हिमायतियों से अमन और मोहब्बत की उम्मीद करना मूर्खता है।
Saturday, September 4, 2010
सोनिया, गडकरी और बालासाहेब ठाकरे
शर्म करो और हो सके तो चुल्लू भर पानी में डूब मरो, इससे बेहतर कोई सलाह उनके लिए मेरे पास नहीं है, जो भरपूर मौका मिलने के बाद खुद तो कुछ नहीं कर सके और सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर अनावश्यक विवाद और अपने निचले दर्ज का नेता होने का प्रमाण पेश कर रहे हैं।
1998 में सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष का पद सौंपा गया। इस समय कांग्रेस में भरपूर बिखराव था, कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं था। भाजपा के लिए मौका था कि वह विपक्षी दल की इस स्थिति का लाभ उठाती, लेकिन जनता के समर्थन और केंद्र में सरकार होने के बावजूद भाजपा लाभ नहीं उठा सकी। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे सर्वमान्य व्यक्ति के नेतृत्व में भी पार्टी कोई ऐसा उदाहरण देश के सामने नहीं रख सकी, जिसे भाजपा के हक में याद किया जाए। पोखरण का विस्फोट सिर्फ बटन दवा कर अपने नाम करना चाहते थे इसलिए जनता ने नकार दिया। सहयोगियों के सामने हमेशा घुटने टेकते रहे, आपसी खींचतान चरम पर रही, प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री के बीच मतभेद नजर आए। और सबसे शर्मनाक स्थिति यह थी कि भाजपा की मातृ संस्था यानि आरएसएस और इनके वरिष्ठ नेता ही सरकार के पक्ष में नहीं थे।भाजपा ने अपनी छवि को सुदृढ़ करने के बाजाए चुनावों में सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा जमकर उछला। भाजपा को सोते-जागते विदेशी मूल के अलावा और कुछ सूझा ही नहीं। सुषमा स्वराज और उमा भारती तो सिर मुंडाने के लिए तैयार हो गई थीं। विरोध की यह बेतुकी परिपाटी भाजपा की ही देन है, और दुर्भाग्य की आज तक बदस्तूर जारी है। अब जबकि सोनिया गांधी को उनकी पार्टी ने लगातार चौथी बार अध्यक्ष चुन लिया तो भाजपा कहती है कि वे प्रधानमंत्री की तरह अध्यक्ष पद भी छोड़कर दिखाएं।इससे स्पष्ट होता है कि भाजपा ने सोनिया गांधी से हार मान ली है, भाजपा ने मान लिया है कि जबतक सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हैं कांग्रेस का बाल बांका नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा नहीं तो यह कोई तुक की बात नहीं है कि आप प्रधानमंत्री की तरह अध्यक्ष पद छोड़ दें।
अब ठाकरे साहब को देखिए। इस मर्द की मर्दानगी कभी महाराष्ट्र से बाहर नहीं निकल सकी। ऐसा नहीं है कि मौका नहीं मिला। देश के करीब-करीब हर हिस्से में शिवसेना की इकाईयां हैं, लेकिन उनकी औकात वहां नहीं है, क्योंकि ठाकरे का पौरुष सिर्फ महाराष्ट्र में रोजी-रोटी कमा रहे उत्तर भारतीयों और सामना की संपादकीय में ही दिखाई देता है। बाहर निकलने का दम इनमें नहीं है, इसलिए इनके मुंह से भी यह बातें शोभा नहीं देतीं।
लगे हाथ कुछ और सूरमाओं की बात कर लें। शरद पवार, तारिक अनवर और पीए संगमा। इन तीनों को सोनिया के विदेशी मूल का होने से ऐतराज था। पार्टी छोड़ी और आज सोनिया की कृपा ही जिंदा हैं। शरद पवार का समय पूरा हो रहा है, इसलिए सोनिया की कृपा से अपनी बेटी को राजनीति में दाखिल करवा लिया और संगमा को कोई पूछ नहीं रहा, उनकी भी बेटी आज सोनिया की कृपा पर देश की सबसे छोटी सांसद बनकर खुश है।
इन सबका मतलब सोनिया का प्रशस्तिगान नहीं है। सोनिया को देश पहली ही पारी में नकार चुका था और लगातार तीन बार भाजपा को मौका दिया। लेकिन भाजपा इतनी नाकारा निकली की नकार चुकी सोनिया को देश ने पुन: अंगीकार किया। सत्ता जनता की भावनाओं की कद्र करने और विपक्ष उसकी अधिकारों की आवाज उठाने के लिए होता है। भाजपा दोनों ही मोर्चों पर फेल रही। राम मंदिर जैसे जनजन से जुड़े भावनात्मक मुद्दे पर भाजपा गठबंधन के सहयोगियों के सामने जिस मजबूती से खड़ी नहीं हो सकी, जबकि कांग्रेस ने अमेरिका के साथ परमाणु करार जैस विषय पर सरकार को दांव पर लगाकर वामपंथियों को दरकिनार कर दिया। सोनिया गांधी का इसके पीछे सरकार को भरपूर समर्थन रहा। जबकि मंदिर निर्माण जैसे पवित्र आंदोलन के पीछे भाजपा अध्यक्ष हमेशा पूर्णजनादेश की बातें करके जनता को बरगलाते रहे।
तब से अब तक इस तरह की बहुत सी बातें हैं कहने के लिए, लेकिन लब्बोलुआब यही है कि सोनिया गांधी को यहां तक पहुंचने में सोनिया गांधी की कोई योग्यता या कोई उपलब्धी नहीं है, असल बात यह है कि जनता ने जिन्हें विकल्प के रूप में चुना था वे खोखले साबित हुए और देश को सोनिया के नेतृत्व में सरकार को चुनना पड़ा। रही बात कांग्रेस की कांग्रेस में यदि कोई कद्दावर होता तो राजीव गांधी के स्वर्गवास के बाद कांग्रेस की जो दुर्गती हुई थी वह न होती। वे पहले से ही कांग्रेस को गांधी परिवार की बापौती माने बैठे हैं, इसलिए उनकी वीरता पर चर्चा करना बेकार है।
1998 में सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष का पद सौंपा गया। इस समय कांग्रेस में भरपूर बिखराव था, कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं था। भाजपा के लिए मौका था कि वह विपक्षी दल की इस स्थिति का लाभ उठाती, लेकिन जनता के समर्थन और केंद्र में सरकार होने के बावजूद भाजपा लाभ नहीं उठा सकी। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे सर्वमान्य व्यक्ति के नेतृत्व में भी पार्टी कोई ऐसा उदाहरण देश के सामने नहीं रख सकी, जिसे भाजपा के हक में याद किया जाए। पोखरण का विस्फोट सिर्फ बटन दवा कर अपने नाम करना चाहते थे इसलिए जनता ने नकार दिया। सहयोगियों के सामने हमेशा घुटने टेकते रहे, आपसी खींचतान चरम पर रही, प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री के बीच मतभेद नजर आए। और सबसे शर्मनाक स्थिति यह थी कि भाजपा की मातृ संस्था यानि आरएसएस और इनके वरिष्ठ नेता ही सरकार के पक्ष में नहीं थे।भाजपा ने अपनी छवि को सुदृढ़ करने के बाजाए चुनावों में सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा जमकर उछला। भाजपा को सोते-जागते विदेशी मूल के अलावा और कुछ सूझा ही नहीं। सुषमा स्वराज और उमा भारती तो सिर मुंडाने के लिए तैयार हो गई थीं। विरोध की यह बेतुकी परिपाटी भाजपा की ही देन है, और दुर्भाग्य की आज तक बदस्तूर जारी है। अब जबकि सोनिया गांधी को उनकी पार्टी ने लगातार चौथी बार अध्यक्ष चुन लिया तो भाजपा कहती है कि वे प्रधानमंत्री की तरह अध्यक्ष पद भी छोड़कर दिखाएं।इससे स्पष्ट होता है कि भाजपा ने सोनिया गांधी से हार मान ली है, भाजपा ने मान लिया है कि जबतक सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हैं कांग्रेस का बाल बांका नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा नहीं तो यह कोई तुक की बात नहीं है कि आप प्रधानमंत्री की तरह अध्यक्ष पद छोड़ दें।
अब ठाकरे साहब को देखिए। इस मर्द की मर्दानगी कभी महाराष्ट्र से बाहर नहीं निकल सकी। ऐसा नहीं है कि मौका नहीं मिला। देश के करीब-करीब हर हिस्से में शिवसेना की इकाईयां हैं, लेकिन उनकी औकात वहां नहीं है, क्योंकि ठाकरे का पौरुष सिर्फ महाराष्ट्र में रोजी-रोटी कमा रहे उत्तर भारतीयों और सामना की संपादकीय में ही दिखाई देता है। बाहर निकलने का दम इनमें नहीं है, इसलिए इनके मुंह से भी यह बातें शोभा नहीं देतीं।
लगे हाथ कुछ और सूरमाओं की बात कर लें। शरद पवार, तारिक अनवर और पीए संगमा। इन तीनों को सोनिया के विदेशी मूल का होने से ऐतराज था। पार्टी छोड़ी और आज सोनिया की कृपा ही जिंदा हैं। शरद पवार का समय पूरा हो रहा है, इसलिए सोनिया की कृपा से अपनी बेटी को राजनीति में दाखिल करवा लिया और संगमा को कोई पूछ नहीं रहा, उनकी भी बेटी आज सोनिया की कृपा पर देश की सबसे छोटी सांसद बनकर खुश है।
इन सबका मतलब सोनिया का प्रशस्तिगान नहीं है। सोनिया को देश पहली ही पारी में नकार चुका था और लगातार तीन बार भाजपा को मौका दिया। लेकिन भाजपा इतनी नाकारा निकली की नकार चुकी सोनिया को देश ने पुन: अंगीकार किया। सत्ता जनता की भावनाओं की कद्र करने और विपक्ष उसकी अधिकारों की आवाज उठाने के लिए होता है। भाजपा दोनों ही मोर्चों पर फेल रही। राम मंदिर जैसे जनजन से जुड़े भावनात्मक मुद्दे पर भाजपा गठबंधन के सहयोगियों के सामने जिस मजबूती से खड़ी नहीं हो सकी, जबकि कांग्रेस ने अमेरिका के साथ परमाणु करार जैस विषय पर सरकार को दांव पर लगाकर वामपंथियों को दरकिनार कर दिया। सोनिया गांधी का इसके पीछे सरकार को भरपूर समर्थन रहा। जबकि मंदिर निर्माण जैसे पवित्र आंदोलन के पीछे भाजपा अध्यक्ष हमेशा पूर्णजनादेश की बातें करके जनता को बरगलाते रहे।
तब से अब तक इस तरह की बहुत सी बातें हैं कहने के लिए, लेकिन लब्बोलुआब यही है कि सोनिया गांधी को यहां तक पहुंचने में सोनिया गांधी की कोई योग्यता या कोई उपलब्धी नहीं है, असल बात यह है कि जनता ने जिन्हें विकल्प के रूप में चुना था वे खोखले साबित हुए और देश को सोनिया के नेतृत्व में सरकार को चुनना पड़ा। रही बात कांग्रेस की कांग्रेस में यदि कोई कद्दावर होता तो राजीव गांधी के स्वर्गवास के बाद कांग्रेस की जो दुर्गती हुई थी वह न होती। वे पहले से ही कांग्रेस को गांधी परिवार की बापौती माने बैठे हैं, इसलिए उनकी वीरता पर चर्चा करना बेकार है।
Wednesday, September 1, 2010
सियासत की शिकार श्रीराम जन्मभूमि
अयोध्या फिर सुर्खियों में है, फैसला आने वाला है...यहां भगवान राम का मंदिर होगा या बाबरी मस्जिद। सरकार ने ऐहतियातन सुरक्षा की आपात योजना तैयार कर डाली है, धारा 144 लागू कर दी गई है क्योंकि भगवान वाले और खुदा के खुदमुख्तारों ने फैसले से पहले ही ऐलान कर दिया है कि दूसरे के हक में फैसला मंजूर नहीं करेंगे। यानि सियासत चरम पर है और फैसला कुछ भी हो कुछ न कुछ फसाद या हलचल तय मानी जा रही है।
फसाद इसलिए नहीं कि किसी को खुदा या राम से मुहब्बत है बल्कि इसलिए कि दोनों ही कौमों के चंद स्वयंभू नेता इस मसले पर राजनीतिक रोटियां सेंकने को तैयार हैं। सदियों से रामजन्म भूमि इसी सियासती की श्किार है। इनके सियासी स्वार्थ सेहतमंद रहें इसलिए आम जनता को राम और अल्लाह के नाम पर लड़वाया जाता रहा। पहले यह काम अंग्रेजों ने किया और अब नेता कर रहे हैं। अंग्रेजों ने स्वाधीनता आंदोलन में हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोडऩे के लिए सबसे पहले मस्जिद का सहारा लिया था। उपलब्ध साक्ष्यों में हेरफेर करके उन्हें प्रचारित किया और बाद में उन्हीं तथ्यों को उल्लेख इतिहासकार अपनी पुस्तकों में करते आए।
1889 के पहले लिखे गए किसी भी सरकारी या गैरसरकारी दस्तावेज और मुस्लिम इतिहासकारों के 'नामेÓ कहीं भी मस्जिद बनाने का आरोप बाबर पर नहीं लगाते, लेकिन इसके बाद जो भी दस्तावेज तैयार हुए या इतिहासकारों ने बाबरकाल का उल्लेख अपनी पुस्तकों में किया उनमें स्पष्ट लिखा कि बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया।
असल में मंदिर तोडऩे का गुनाह इब्राहीम लोधी ने किया था। उसने 17 सितंबर 1523 को मस्जिद की नींव डाली थी और 10 सितंबर 1524 को मस्जिद बनकर तैयार हुई। बाबर का आक्रमण इसके बाद हुआ। बाबर को हिन्दुतान बुलाने का गुनाह पंजाब के सूबेदार और इब्राहीम लोधी के चचा दौलत खां और रणथंबोर के हिन्दू राजपूत राणा सांगा ने किया था। बाबर हिन्दुस्तान आया और 20 अप्रैल 1526 को पानीपत के मैदान में उसने इब्राहीम लोधी को पराजित कर उसकी सल्तनत छीन ली। बाबर का साम्राज्य बढ़ता गया और फिर उसके ही एक सूबेदार मीर बांकी ने लोधी द्वारा बनवाई मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद कर दिया, यह ठीक वैसा ही है जैसे आज गांधी, नेहरू और किदवई नगर हैं, गांधी, नेहरू, किदवई को यह पता ही नहीं है कि उनके नाम से कोई नगर या सड़क है। मस्जिद के बाहर एक शिलालेख में मस्जिद निर्माण से संबंधित जानकारी थी, यह शिलालेख 1889 तक पढ़े जाने लायक था। एक अंग्रेस अफसर ए फ्यूरर ने इस शिलालेख का अनुवाद किया था जो आज भी आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में दफन है। स्वाधीनता संग्राम में जब हिन्दू-मुस्लिम दोनों ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ इंकलाब का नारा बुलंद किया तब इस एकता को तोडऩे के लिए अंग्रेजों ने इस शिलालेख को तोड़ दिया। इसके अलावा अंग्रेज अफसर कनिंघम जिसके पास पुरातत्व महत्व की इमारतों की देखरेख की जिम्मेदारी थी, ने चालाकी से लखनऊ गजेटियर में यह दर्ज कराया कि मस्जिद निर्माण के समय एक लाख चौहत्तर हजार हिन्दुओं का कत्ल किया गया था। लेकिन उस वक्त ऐसे संसाधन उपलब्ध नहीं थे जिससे कनिंघम के झूठ को पकड़ा जा सके। जबकि फैजाबाद गजेटियर के मुताबिक 1869 में पूरे फैजाबाद की आबादी 9949 थी, यह वो समय था जब राजाज्ञा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था, ऐसा कोई साधन नहीं था कि अचानक कहीं आया जाया जा सके, फिर 1526 में पौने दो लाख हिन्दू एक जगह अचानक कैसे एकत्रित हो गए। इस बात को आज बखूबी समझा जा सकता है।
अंग्रेजों के इस कुकर्म से कुछ विद्वान इन तथ्यों से परिचित थे और फिर अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि है यह सत्य किसी पुस्तक का मोहताज नहीं, इसलिए 1857 में मुसलमानों के तत्कालीन क्रांतिकारी नेता अमीर अली ने मुसलमानों से एक सभा में अपील की थी कि हमारा फर्जे इलाही हमें मजबूर करता है, हम हिन्दुओं के खुदा रामचंद्र जी की पैदाइशी जगह पर जो मस्जिद बनी है, उसे बाखुशी उनके सुपुर्द कर दें, क्योंकि यही दोनों के बीच नाइत्तेफाकी की सबसे बड़ी बजह है। अमीर अली की इस बात का सबने समर्थन किया था। लेकिन अंग्रेज इससे घबरा गए, उन्होंने अमीर अली और बाबा रामचरणदास को फांसी पर लटका दिया। सुल्तानपुर गजेटियर के पेज 36 पर इसका उल्लेख है। संत रामशरणदास की पुस्तक श्रीराम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद, तथ्य और सत्य में भी इसका उल्लेख है।
अंग्रेजों की हूबहू भूमिका में आज के नेता हैं। यह मंदिर मस्जिद विवाद हल करना ही नहीं चाहते, अन्यथा ऐसे कई मौके आए जब इसका समाधान निकल सकता था। लखनऊ में 11 अक्टूबर 1990 को 7 राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठनों सामूहिक बैठक में निर्णय किया था कि 30 अक्टूबर से पहले किसी भी दिन बाबरी मस्जिद को हटाकर राम मंदिर निर्माण के लिए विवादित भूमि सौंप दी जाए। इस बैठक में मुस्लिम फॉर प्रोग्रेस के अध्यक्ष शरीफ जमाल कुरैशी, मुस्लिमे हिन्द के अध्यक्ष मोहम्मद आलम कोया, राष्ट्रवादी मुस्लिम फ्रंट के अध्यक्ष अब्दुल हकीम खां, दस्तकार मोर्चे के असद अंसारी, मुस्लिम संघर्ष वाहिनी के अध्यक्ष अय्यूब सईद, मुस्लिम महिला संगठन की श्रीमती नफीसा शेख तथा भारतीय मुस्लिम युवा सम्मेलन के मुख्तार अब्बास नकवी शामिल थे। यही वो समय था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने आरएसएस प्रमुख देवरस जी को बुलाकर कहा था कि गैर विवादित भूमि पर विश्व हिन्दू परिषद की अगुवाई में मंदिर निर्माण का कार्य आरंभ करें, जबतक कार्य विवादित भूमि तक पहुंचेगा मामला सुलझा दिया जाएगा। देवरस जी और विहिप इसके लिए तैयार थे, लेकिन सत्ता की लालच में डूबे लालकृष्ण आडवाणी के सामने दोनों को झुकना पड़ा। आडवाणी जी 25 सितंबर को ही रथ पर सवार हो चुके थे, जिससे उतरना उन्हें गवारा नहीं हुआ और उसके बाद जो हुआ वह सबके सामने है। आज विहिप मंदिर निर्माण में आणवाणी को सबसे बड़ी बाधा बताता है। आडवाणी ने यदि रथयात्रा की जिद न करके राव की बात पर चलने और मुस्लिम संगठनों की बैठक में हुए फैसले को स्वीकार कर लिया होता तो संभवत: अब तक जन्मभूमि पर भव्य मंदिर होता। भाजपा ने हिन्दुओं के वोट पाने के लिए इस आंदोलन को ऊंचाईयां दीं और सत्ता मिलने के बाद इससे किनारा कर लिया। ऐसा एक नहीं कई बार हुआ। अंतत: जनता ने सच को समझा और इन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया, तो अब फिर भाजपा राम की शरण में है।
अदालत से जो फैसला आना है वह इन तथ्यों पर आएगा कि वहां वास्तव में कोई मंदिर था या नहीं। मुस्लिमों का कहना है कि जिस स्थान पर मस्जिद बनी है वहां पहले कोई मंदिर था ही नहीं। इस विषय पर कई बार बैठकें और वार्ताएं हो चुकी हैं। पुरातत्व विभाग की टीम ने यहां खुदाई करके भी देखा, जिसकी रिपोर्ट अदालत को दे दी गई है। हालांकि यहां खुदाई जैसे किसी उपक्रम की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि ऐसी कई निशानियां मौजूद हैं जिससे पता चलता है कि यहां मंदिर था। मसल मस्जिद का ऊपरी हिस्सा जिन 14 खंबों पर टिका हुआ है उनमें हिन्दू देवी देवताओं की आकृतियां विद्यमान हैं। मस्जिद में कहीं भी लकड़ी का उपयोग नहीं होता, जबकि यहां बड़ी मात्रा में लकड़ी का उपयोग किया गया है। मस्जिद में हरहाल में एक पानी की टंकी होती है, बाबरी मस्जिद में इसकी व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा सबसे बड़ी बात इस्लमा के मुताबिक विवादित स्थल पर नमाज नहीं पढ़ी जा सकती और पिछले करीब 40 वर्षों से यहां नमाज पढ़ी भी नहीं जा रही है, इसलिए उपलब्ध साक्ष्यों और इस्लामिक मान्यता को ध्यान में रखकर मुस्लिमों को खुशी-खुशी अपने पूर्व में लिए गए निर्णयों पर अमल करना चाहिए। अदालत का निर्णय चाहे जो भी आए।
फसाद इसलिए नहीं कि किसी को खुदा या राम से मुहब्बत है बल्कि इसलिए कि दोनों ही कौमों के चंद स्वयंभू नेता इस मसले पर राजनीतिक रोटियां सेंकने को तैयार हैं। सदियों से रामजन्म भूमि इसी सियासती की श्किार है। इनके सियासी स्वार्थ सेहतमंद रहें इसलिए आम जनता को राम और अल्लाह के नाम पर लड़वाया जाता रहा। पहले यह काम अंग्रेजों ने किया और अब नेता कर रहे हैं। अंग्रेजों ने स्वाधीनता आंदोलन में हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोडऩे के लिए सबसे पहले मस्जिद का सहारा लिया था। उपलब्ध साक्ष्यों में हेरफेर करके उन्हें प्रचारित किया और बाद में उन्हीं तथ्यों को उल्लेख इतिहासकार अपनी पुस्तकों में करते आए।
1889 के पहले लिखे गए किसी भी सरकारी या गैरसरकारी दस्तावेज और मुस्लिम इतिहासकारों के 'नामेÓ कहीं भी मस्जिद बनाने का आरोप बाबर पर नहीं लगाते, लेकिन इसके बाद जो भी दस्तावेज तैयार हुए या इतिहासकारों ने बाबरकाल का उल्लेख अपनी पुस्तकों में किया उनमें स्पष्ट लिखा कि बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया।
असल में मंदिर तोडऩे का गुनाह इब्राहीम लोधी ने किया था। उसने 17 सितंबर 1523 को मस्जिद की नींव डाली थी और 10 सितंबर 1524 को मस्जिद बनकर तैयार हुई। बाबर का आक्रमण इसके बाद हुआ। बाबर को हिन्दुतान बुलाने का गुनाह पंजाब के सूबेदार और इब्राहीम लोधी के चचा दौलत खां और रणथंबोर के हिन्दू राजपूत राणा सांगा ने किया था। बाबर हिन्दुस्तान आया और 20 अप्रैल 1526 को पानीपत के मैदान में उसने इब्राहीम लोधी को पराजित कर उसकी सल्तनत छीन ली। बाबर का साम्राज्य बढ़ता गया और फिर उसके ही एक सूबेदार मीर बांकी ने लोधी द्वारा बनवाई मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद कर दिया, यह ठीक वैसा ही है जैसे आज गांधी, नेहरू और किदवई नगर हैं, गांधी, नेहरू, किदवई को यह पता ही नहीं है कि उनके नाम से कोई नगर या सड़क है। मस्जिद के बाहर एक शिलालेख में मस्जिद निर्माण से संबंधित जानकारी थी, यह शिलालेख 1889 तक पढ़े जाने लायक था। एक अंग्रेस अफसर ए फ्यूरर ने इस शिलालेख का अनुवाद किया था जो आज भी आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में दफन है। स्वाधीनता संग्राम में जब हिन्दू-मुस्लिम दोनों ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ इंकलाब का नारा बुलंद किया तब इस एकता को तोडऩे के लिए अंग्रेजों ने इस शिलालेख को तोड़ दिया। इसके अलावा अंग्रेज अफसर कनिंघम जिसके पास पुरातत्व महत्व की इमारतों की देखरेख की जिम्मेदारी थी, ने चालाकी से लखनऊ गजेटियर में यह दर्ज कराया कि मस्जिद निर्माण के समय एक लाख चौहत्तर हजार हिन्दुओं का कत्ल किया गया था। लेकिन उस वक्त ऐसे संसाधन उपलब्ध नहीं थे जिससे कनिंघम के झूठ को पकड़ा जा सके। जबकि फैजाबाद गजेटियर के मुताबिक 1869 में पूरे फैजाबाद की आबादी 9949 थी, यह वो समय था जब राजाज्ञा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था, ऐसा कोई साधन नहीं था कि अचानक कहीं आया जाया जा सके, फिर 1526 में पौने दो लाख हिन्दू एक जगह अचानक कैसे एकत्रित हो गए। इस बात को आज बखूबी समझा जा सकता है।
अंग्रेजों के इस कुकर्म से कुछ विद्वान इन तथ्यों से परिचित थे और फिर अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि है यह सत्य किसी पुस्तक का मोहताज नहीं, इसलिए 1857 में मुसलमानों के तत्कालीन क्रांतिकारी नेता अमीर अली ने मुसलमानों से एक सभा में अपील की थी कि हमारा फर्जे इलाही हमें मजबूर करता है, हम हिन्दुओं के खुदा रामचंद्र जी की पैदाइशी जगह पर जो मस्जिद बनी है, उसे बाखुशी उनके सुपुर्द कर दें, क्योंकि यही दोनों के बीच नाइत्तेफाकी की सबसे बड़ी बजह है। अमीर अली की इस बात का सबने समर्थन किया था। लेकिन अंग्रेज इससे घबरा गए, उन्होंने अमीर अली और बाबा रामचरणदास को फांसी पर लटका दिया। सुल्तानपुर गजेटियर के पेज 36 पर इसका उल्लेख है। संत रामशरणदास की पुस्तक श्रीराम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद, तथ्य और सत्य में भी इसका उल्लेख है।
अंग्रेजों की हूबहू भूमिका में आज के नेता हैं। यह मंदिर मस्जिद विवाद हल करना ही नहीं चाहते, अन्यथा ऐसे कई मौके आए जब इसका समाधान निकल सकता था। लखनऊ में 11 अक्टूबर 1990 को 7 राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठनों सामूहिक बैठक में निर्णय किया था कि 30 अक्टूबर से पहले किसी भी दिन बाबरी मस्जिद को हटाकर राम मंदिर निर्माण के लिए विवादित भूमि सौंप दी जाए। इस बैठक में मुस्लिम फॉर प्रोग्रेस के अध्यक्ष शरीफ जमाल कुरैशी, मुस्लिमे हिन्द के अध्यक्ष मोहम्मद आलम कोया, राष्ट्रवादी मुस्लिम फ्रंट के अध्यक्ष अब्दुल हकीम खां, दस्तकार मोर्चे के असद अंसारी, मुस्लिम संघर्ष वाहिनी के अध्यक्ष अय्यूब सईद, मुस्लिम महिला संगठन की श्रीमती नफीसा शेख तथा भारतीय मुस्लिम युवा सम्मेलन के मुख्तार अब्बास नकवी शामिल थे। यही वो समय था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने आरएसएस प्रमुख देवरस जी को बुलाकर कहा था कि गैर विवादित भूमि पर विश्व हिन्दू परिषद की अगुवाई में मंदिर निर्माण का कार्य आरंभ करें, जबतक कार्य विवादित भूमि तक पहुंचेगा मामला सुलझा दिया जाएगा। देवरस जी और विहिप इसके लिए तैयार थे, लेकिन सत्ता की लालच में डूबे लालकृष्ण आडवाणी के सामने दोनों को झुकना पड़ा। आडवाणी जी 25 सितंबर को ही रथ पर सवार हो चुके थे, जिससे उतरना उन्हें गवारा नहीं हुआ और उसके बाद जो हुआ वह सबके सामने है। आज विहिप मंदिर निर्माण में आणवाणी को सबसे बड़ी बाधा बताता है। आडवाणी ने यदि रथयात्रा की जिद न करके राव की बात पर चलने और मुस्लिम संगठनों की बैठक में हुए फैसले को स्वीकार कर लिया होता तो संभवत: अब तक जन्मभूमि पर भव्य मंदिर होता। भाजपा ने हिन्दुओं के वोट पाने के लिए इस आंदोलन को ऊंचाईयां दीं और सत्ता मिलने के बाद इससे किनारा कर लिया। ऐसा एक नहीं कई बार हुआ। अंतत: जनता ने सच को समझा और इन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया, तो अब फिर भाजपा राम की शरण में है।
अदालत से जो फैसला आना है वह इन तथ्यों पर आएगा कि वहां वास्तव में कोई मंदिर था या नहीं। मुस्लिमों का कहना है कि जिस स्थान पर मस्जिद बनी है वहां पहले कोई मंदिर था ही नहीं। इस विषय पर कई बार बैठकें और वार्ताएं हो चुकी हैं। पुरातत्व विभाग की टीम ने यहां खुदाई करके भी देखा, जिसकी रिपोर्ट अदालत को दे दी गई है। हालांकि यहां खुदाई जैसे किसी उपक्रम की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि ऐसी कई निशानियां मौजूद हैं जिससे पता चलता है कि यहां मंदिर था। मसल मस्जिद का ऊपरी हिस्सा जिन 14 खंबों पर टिका हुआ है उनमें हिन्दू देवी देवताओं की आकृतियां विद्यमान हैं। मस्जिद में कहीं भी लकड़ी का उपयोग नहीं होता, जबकि यहां बड़ी मात्रा में लकड़ी का उपयोग किया गया है। मस्जिद में हरहाल में एक पानी की टंकी होती है, बाबरी मस्जिद में इसकी व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा सबसे बड़ी बात इस्लमा के मुताबिक विवादित स्थल पर नमाज नहीं पढ़ी जा सकती और पिछले करीब 40 वर्षों से यहां नमाज पढ़ी भी नहीं जा रही है, इसलिए उपलब्ध साक्ष्यों और इस्लामिक मान्यता को ध्यान में रखकर मुस्लिमों को खुशी-खुशी अपने पूर्व में लिए गए निर्णयों पर अमल करना चाहिए। अदालत का निर्णय चाहे जो भी आए।
Sunday, August 29, 2010
पाक की मदद से बेहतर है कुत्ते को रोटी खिला दो
पाकिस्तान ऐसी वेश्या है जो पैसे के लिए किसी के साथ भी हमबिस्तर हो सकती है, लेकिन प्यार करने वाले को गले नहीं लगा सकती। हालांकि वफा वह पैसा देने वालों से भी नहीं करती, बस वफा का नाटक करती है। इन शब्दों से संभव है कई लोगों को ऐतराज हो, लेकिन पाकिस्तान की हालिया हरकत के जबाव में मेरे पास इससे बेहतर उदाहरण नहीं है।भारत बाढ़ पीडि़तों की नि:स्वार्थ मदद करना चाहता है, स्वयं सबसे पहले पेशकश की, पहले पाकिस्तान ने ना-नुकुर किया, फिर सहायता स्वीकार कर ली राहत कर्मियों को वीजा नहीं दिया और अब कहता है कि अपनी सहायता संयुक्त राष्ट्र संघ के जरिए भेजिए। दूसरी ओर चीन हथियार दे रहा है, परमाणु सामग्री दे रहा है, अमेरिका भरपूर पैसा दे रहा है, इसलिए पाकिस्तान उनके सामने दुम हिलाता रहता है। चीन के लिए अमेरिका को और अमेरिका के लिए चीन को चूतिया बनाकर अपना हित साधता रहता है। इसलिए कहता हूं कि पाकिस्तान की मदद करने बेहतर है कि किसी कुत्ते को रोटी खिला दो। क्योंकि रोटी खाने के बाद कुत्ता वफादारी निभाता और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इससे राहू नियंत्रित होता है।बाढ़ से कराह रही जनता के परिप्रक्ष्य में यह दूसरी आपत्तिजनक बात हो सकती है। क्योंकि आपत्तिकाल में फंसे व्यक्ति की सहायता करना किसी का भी परमकर्तव्य है। किंतु जो भारत विरोधी नारे लगाने में शामिल हों और जिनका मुस्तकबिल न केवल हरामखोर बल्कि गद्दार और एहसानफरामोश हो उनके प्रति न तो मेरे मन में कोई संवेदना है ना ही प्रेम। मुंबई हमलों के गुनहगार हाफिज सईद की रैली में लाखों पाकिस्तानियों ने भारत के खिलाफ जहर उगला, राष्ट्रीय ध्वज को आग लगाई। हम उन्हें चंद सईद समर्थक कहकर क्षमा नहीं कर सकते, दूसरी बात पाकिस्तान के किसी भी कौने से कभी भी भारत के खिलाफ चलाए जा रहे नापाक अभियानों के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठती। दूसरी ओर भारत में पाकिस्तान विरोधी बातों पर आलोचनाएं शुरू हो जाती हैं। बेशक राहत शिविरों में कई अच्छे लोग होंगे लेकिन जिस तरह सैकड़ों कुचक्रों को जानने और सहने के बाद भारत का एक बड़ा वर्ग पाकिस्तानियों के पक्ष में खड़ा हो जाता है, सरकार हमेशा दोस्ती और मदद के लिए तैयार रहती है, पाकिस्तान का कोई बंदा ऐसा करने से परेहज करता है और हुक्मरानों का कमीनापन तो दुनिया वर्षों से देख रही है। इस मुसीबत के समय में भी पाकिस्तानी हुक्मरान सिर्फ इसलिए मदद स्वीकार करने में आनाकानी कर रहे हैं, ताकि अपनी जनता से कह सकें कि हमने विपत्ती के समय में भी पड़ोसी मुल्क से मदद नहीं ली। कालांतर में यही काम जुल्फिकार अली भुट्टो ने भी किया था। उन्होंने अपनी जनता को आश्वस्त किया था कि हम हजार वर्षों तक घास की रोटी खा लेंगे लेकिन भारत के सामने नहीं झुकेंगे। हालांकि भारत ने कभी पाकिस्तान को झुकाने की नीयत से न तो मदद की न लड़ाई। फिर भी पाकिस्तान का रवैया सदैव उकसाने और पीठ में छुरा घोंपने वाला रहा। बहरहाल जुल्फिकार अली को फांसी पर लटका दिया और पाकिस्तानी सेना को भारतीय फौजों ने कुत्तों की तरह मारकर भगा दिया।एक और महत्वपूर्ण मसला। पाकिस्तान को आज तक जिन देशों ने मदद की है उनकी मदद का दुरुपयोग भारत के खिलाफ हुआ। इसके अलावा अहसान फरामोश भी है। अमेरिका लाखों डालर की मदद आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों और आम जनता की बेहतरी के लिए करता है, लेकिन पाकिस्तन इसका इस्तेमाल आतंकियों को पालने-पोसने और भारत के खिलाफ फौजों की तैयारी में खर्च करता है। इस वक्त चीन की जांघ पर बैठकर उसे सहला रहा है, पीओके का मालिकाना हक उसे सौंपने जा रहा है, क्योंकि चीन ने अमेरिकी विरोध के बावजूद पाकिस्तान से परमाणु करार कर लिया है और हथियार तो देता ही रहता है। पाक दोनों को बेवकूफ बना रहा है, कभी चीन को सहलाता है और जिस दिन अमेरिका आंख दिखाता है उसके सामने 90 अंश पर झुक जाता है।हालांकि चीन और अमेरिका भी स्वार्थी हैं, वे अपने-अपने स्वार्थों के लिए ही उसकी मदद करते हैं उन्हें पाकिस्तान की आबादी से कोई मतलब नहीं है, फिर भी पाकिस्तान हंसकर उनकी हर मदद स्वीकार करता है, लेकिन भारत नि:स्वार्थ मदद करता है, उसके उज्जवल भविष्य की कामना करता है, इसलिए किसी अय्याश वेश्या की तरह पाकिस्तान उसके सामने अकड़ता रहा है। बहरहाल हमारी संस्कृति सांपों को दूध पिलाने और बिच्छू को पानी से बाहर निकालने की रही है, इसलिए हमारी सरकार संयुक्त राष्ट्र के जरिए ही दुखी-पीडि़त जनता को मदद करने की तैयारी कर रही है।
Friday, August 27, 2010
समझो ड्रेगन की चाल
विवादित कश्मीर में नत्थी वीजा, वरिष्ठ सैन्य अफसर को वीजा नहीं देना, ब्रह्मपुत्र पर बांध, सीमा पर सड़क, सीमा पर मिसाइल, परमाणु पनडुब्बियों को छिपा कर रखने के लिए सुरंगें, पाकिस्तान के साथ परमाणु करार और हर कदम पर भारत के विरोध में मदद, नेपाल को भारत के खिलाफ भड़काना, एवरेस्ट पर सड़क, 40 अरब डालर के व्यापार की चकाचौंध में चौंधियाये देश के कर्णधारों को चीन की ये गतिविधियां दिखाई नहीं दे रहीं हैं, जिनके चलते उसने भारत पर पूरी तरह शिकंजा कसने की तैयारी कर रखी है। और आगामी तैयारियों के तहत वह भारत को पूरी तरह विवश करने का प्रयास करेगा। इसके लिए उसने पाकिस्तान, बांगलादेश और ताजा-ताजा गणतंत्र देशों में शामिल हुए नेपाल को हथियार बना रहा है।पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश में अपना जाल बिछाकर चीन लगातार भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के साथ परमाणु समझौता कर चुका है। बांग्लादेश के रूपपुर में भी चीन परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने में सहयोग की पेशकश कर चुका है। नेपाल में जबसे माओवादियों का राजनीतिक वर्चस्व बढ़ा है लगातार नेपाल चीन की ओर झुकता जा रहा है। वैश्विक एजेंसियां लगातार इस बात की शंका जाहिर कर रही हैं कि पाक परमाणु हथियार कहीं आतंकवादियों के हाथ न लग जाएं। लेकिन चीन को इसकी चिंता नहीं है। उसका लक्ष्य मात्र भारत को घेरना है। इसलिए वे आतंक के निर्यातक ही सही चीन उनकी मदद करेगा। लेकिन भारत सरकार को यह दिखाई नहीं दे रहा है, सब उलझे हुए हैं देशी जनता को वोटों के लिए आपस में लड़ाने में धर्म, आरक्षण और जातिवाद की भट्टïी झोंकने में। किसी की जुर्ररत नहीं कि पड़ोसी की ओर आंखें तरेर कर कह सके, फलां जगह आपकी स्वतंत्रता और सत्ता समाप्त होती है और इसीलिए चीन छाती पर चढ़ता आ रहा है। हालिया वीजा विवाद में हालांकि विदेश मंत्रालय ने सख्ती दिखाई है, लेकिन रक्षा मंत्री अब भी दो टूक बोलने से परहेज कर रहे हैं, न जाने क्यों उन्हें एक धोखेबाज से द्विपक्षीय संबंधों में लाल लगे दिख रहे हैं।
Sunday, August 22, 2010
कब होंगे इतने उदार, हमारे अमीर
अमीरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। नई अर्थव्यवस्था में यह आश्चर्यजनक नहीं है। भारत में अगर चीन और जापान से अधिक अमीर हैं तो यह नई व्यवस्था का कमाल है जो हरहाल में मशीनरी विकसित कर रही है जिससे पैसे वालों को और पैसे वाले बनें और उनकी भूख कभी शांत न हो। इस कमाल की व्यवस्था की एक और विशेषता यह है कि इससे अमीरों और गरीबों के बीच फैसले की खाई दुर्निवार होती जा रही है।अमीरों की दुनिया देखकर जिस कारण सबसे अधिक कोफ्त होती है वह है उनकी सामाजिक जिम्मेदारियों से बढ़ती दूरी। न तो उन्हें सामाजिक सरोकारों से कोई मतलब है न उसके बारे में सोचने की फुर्सत और जिज्ञासा। गांधीजी कहते थे अमीर एक तरह से ट्रस्टी हैं। अमीरों की अनिवार्यत: यह कोशिश होनी चाहिए कि उनके पैसे से गरीबों का भला हो। लेकिन भूमंडलीकरण के दौर में सबकुछ उल्टा हो रहा है। अमीरों द्वारा पैसा खर्च करना तो दूर उल्टे गरीबों का खून चूस रहे हैं। मुकेश अंबानी जैसे देश के उद्योगपति सम्राट की नजर में भारत की आबादी बाजार है, इंसान नहीं।पश्चिम को लगातार उसके रहन-सहन और संस्कृति के नाम पर कोसने वालों को वहां रहने वाल अमीरों के उदार हृदय दिखाई ही नहीं देते। वे इस विषय में कुछ सोचना ही नहीं चाहते कि क्यों अमेरिका के अमीरों ने अपनी आधी संपत्ति सामाजिक सरोकारों के लिए दान कर दी। क्या हमारे उद्योगपति वैश्विक कामयाबी के साथ दबे-कुचले लोगों भला करने का विचार करते हैं या कभी कर पाएंगे। मेरी व्यक्तिगत राय है कि इसकी उम्मीद न के बराबर है। ऐसा इसलिए क्योंकि अब अमीर बन रहे हैं शातिर और चालाक व्यक्ति जो उल्टे-सीधे काम करने, कर चोरी करने और सरकारी नीतियों को अपने हक में बनवाने का महारथ हासिल है। आज अमीरों खासकर नए अमीरों में रईसाना जीवन जीना और देश व समाज की हर फिक्र को धुंए में उड़ाना ही जीवन मूल्य है। अगर वे गरीबों के लिए कुछ करते भी हैं तो उसमें कोई न कोई स्वाथ छिपा होता है। अन्यथा उनकी संस्थाओं, जहां हर आदमी हाड़तोड़ श्रम दे रहा है, में पैदा हो रहा रोजगार ही उनके सामाजिक सरोकारों का चरम है।गांधी और बिनोबा के समय में जमशेद जी टाटा, घनश्याम दास बिड़ला, जे डालमियां जैसे उद्योगपतियों ने सामाजिक विकास के लिए कई काम किए। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च,टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस, टाटा मेमोरियल सेंटर और बिड़ला इंस्टीट्यूट जैसी संस्थाएं सामाजिक सरोकारों को ध्यान में रखकर ही स्थापित की गर्ईं थीं। इसके विपरीत यदि आज कोई इस तरह की बड़ी संस्था स्थापित करता है तो उसका मूल उद्देश्य लाभ कमाना होता है।भारतीय और विदेशी अमीरों के दृष्टिकोण में भी बड़ा फर्क है। इसके लए अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अलगोर का उदाहरण देखा जा सकता है। अलगोर जब डेमोक्रेटिव पार्टी के उम्मीदवार बने तो उनके खिलाफ इसलिए विरोध का माहौल तैयार होने लगा कि उन्होंने तब तक चैरिटी पर केवल 10 हजार डालर ही खर्च किए थे। इसके अलावा वहां ऐसे कई रईस हैं जिन्होंने आदर्श स्थापित कर कई संस्थाओं की मदद की। वहां हावर्ड जैसी ख्यात संस्थाएं भी अनुदान पर चलती हैं, हमारे यहां कोई एकाध आनंद जैसा साधारण व्यक्ति तो सुपर-30 खोल लेता है, लेकिन उद्योगपतियों को एक स्कूल चलाना भी बोझ लगता है। यदि पश्चिमी अमीर इस तरह की सोच से ग्रसित होते तो बिल गेट्स अपनी संपत्ति का 95 प्रतिशत हिस्सा दान नहीं कर पाते। यह राशि शिक्षा और एड्स पर खर्च की जाती है। कुछ वर्षों पूर्व दुनिया के दूसरे अमीर रहे वारेन वुफेट तो और भी आदर्श भूमिका में थे, उन्होंने अपने नाम से कोई फाउंडेशन नहीं बनाया और अपनी 90 प्रतिशत संपत्ति गेट्स के फाउंडेशन को दान कर दी। उस समय यह राशि करीब दो लाख करोड़ थी। अभी हाल ही में अमेरिका के अमीरों ने अपनी आधी संपत्ति दान करने की घोषणा की है, उनमें से किसी एक ने भारतीय अमीरों को भी ऐसा करने की सलाह दी है, लेकिन कहीं से कोई आवाज नहीं आई।
Friday, August 20, 2010
12 साल सोनिया के या...
सोनिया गांधी के पुन: कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने की कवायद शुरू हो चुकी है और वे ही अध्यक्ष होंगी इसमें किसी को लेश मात्र संदेह नहीं है। इतने लंबे समय तक कांग्रेस पर लगाम कसने वाली वे पहली कांग्रेस नेता हैं।लंबे नानुकुर के बाद 1998 में श्रीमती सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली थी। उस समय कांग्रेस की हालत ऐतिहासिक रूप से बद्तर थी। स्व. नरसिंह राव घोटालों में फंसे थे। वरिष्ठï कांग्रेसी इधर-उधर बिना राजा की फौज की तरह भाग रहे थे। आजीवन कांग्रेस को दान करने वाले सीताराम केसरी यद्यपि अध्यक्ष पद संभाल रहे थे लेकिन वे कहीं से अध्यक्ष का दायित्व नहीं निभा पा रहे थे। कुछ कांग्रेसी थे जो पार्टी के बिखराव की इस नस को जानते थे और आखिरकार केसरी जी को बिदा करके उन्होंने सोनिया गांधी को कांग्रेस की कमान सौंप दी। केसरी जी को जिस प्रकार जल्दबाजी में अध्यक्ष पद से हटाया गया इसकी तीखी आलोचना हुई थी, उनके स्वर्गवास को लोगों ने पद से हटाने का सदमा तक करार दिया। बहरहाल सोनिया गांधी ने न केवल कांगे्रस की कमान संभाली बल्कि पार्टी को एकजुट किया, लगातार दो पराजयों का दंस झेलने वाली राष्टï्रीय पार्टी को लगातार दो चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप उभारा और सत्ता पर काबिज कराया। आज उनकी पार्टी और सत्ता पर ऐसी पकड़ है कि उनकी मर्जी के बिना सत्ता और संगठन पत्ता भी नहीं हिलता।सोनिया गांधी की कई मामलों में आलोचना की जा सकती है, लोग करते भी हैं। लेकिन उन्होंने भारतीय राजनीति में जो मिशाल कायम की वह सुनियोजित ही सही, कोई ओर नेता नहीं कर सका। कहा जाता है कि उन्होंने पूरी सोची समझी रणनीति के तहत प्रधानमंत्री का पद त्याग दिया, लाभ के पद के आरोपों के चलते इस्तीफा दिया, विदेशी मूल के मुद्दे पर पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। सोनिया के राजनीतिक विरोधी कहते हैं कि उन्होंने ऐसा केवल सत्ता लोभ के कारण किया। हालांकि यह सर्वविदित है कि 1980 में संजय गांधी की मौत के इंदिरा गांधी अपने बड़े पुत्र राजीव गांधी को राजनीति में लाना चाहती थीं, तब सोनिया ने इसका विरोध किया था। वह अपने पति की मृत्यु के एकदम बाद राजनीति में नहीं आईं। पहले उन्होंने अपने बच्चों की जिम्मेदारी का निर्वाह किया और फिर राजनीति में आईं। ऐसा करने में उन्हें सात साल लग गए। देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी पार्टी सात साल में एक सर्वमान्य नेता पैदा नहीं कर सकी तो इसमें गलती किसकी है? हमारे देश के ही अनेकों नेता देशवासी होने जैसा स्वांग भी नहीं रच सके, जबकि सोनिया गांधी ने आडंवर ही सही भारतीय संस्कृति की छाप, जितनी उन्हें बताई गई या उन्होंने देखी हर जगह छोड़ी। यहां तक कि विदेशी मूल का धुर विरोधी भारतीय राष्टï्रीय स्वयं सेवक संघ को भी समय-समय पर सोनिया की तारीफ करने को विवश होना पड़ा।शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने पार्टी इसीलिए छोड़ी थी क्योंकि उन्हें विदेशी मूल का नेतृत्व स्वीकार नहीं था। आज वही पवार साहब ऐसी सरकार में मंत्री हैं जो सोनिया जी के इशारे से चलती है। प्रमुख विपक्षी दल ने कई तरह से सोनिया गांधी को घेरने की कोशिश की, कहीं-कहीं सफल होते दिखे, लेकिन अंतत: उन्हें मुंह की ही खानी पड़ी। कांग्रेस की अमरवेल बिना नेहरू-गांधी परिवार से लिपटे फलफूल नहीं सकती यह भी साबित हो गया। आज वह लगातार 12 साल तक कांग्रेस अध्यक्ष रहने वाली नेहरू-गांधी परिवार की अकेली सदस्य हैं। उनसे पहले हालांकि मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी अलग-अलग समय पर कांग्रेस का नेतृत्व संभाल चुके हैं, लेकिन इतने लंबे समय तक कोई नहीं रहा। इन 12 वर्षों में कांग्रेस को सत्ता के द्वार तक पहुंचाकर वह उसकी खोई हुई गरिमा को वापस लाईं और एक बार फिर से वंशवाद की स्थापना हुई। कल तक सोनिया गांधी को पार्टी में लाने के लिए उतावले नेता आज राहुल को अपना मुखिया चुनने के लिए बेताब हैं।
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